इश्क की चाशनी है मीर तक़ी मीर की शायरी- ‘न होती मोहब्बत न होता जुहूर’

Urdu Poetry:  मुहब्बत ख़ुदा से हो या माशुका से, मीर तक़ी मीर की शायरी के बिना अधुरी-सी लगती है. कोई उसे इश्क का शायर कहता है तो कई दर्द का. लेकिन वे खुद को शायर नहीं कहकर दीवाना कहते हैं. मीर साहब एक जगह कहते हैं- “हमको शायर न कहो मीर कि साहिब हमने
दर्दो ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया.”

आगरा में जन्मे मीर तक़ी मीर का असल नाम मोहम्मद तकी था. वे उर्दू और फ़ारसी भाषा के महान शायर थे. मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो. मीर साहब ने दिल्ली की सल्तनतों के बदलते देखा है. इस बदलाव में ना जाने कितने निर्दोष और मासूमों का खून बहा, इसका दर्द- त्रासदी उनकी रचनाओं में सैलाब की तरह उमड़ता है. दिल्ली पर अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों से पहले मीर तक़ी मीर पिता के प्यार और करुणा में एक शानदार जीवन बीता रहे थे. इसी मुहब्बत और करुणा का उनकी शायरी में असर साफ दिखलाई पड़ता है.

मीर तक़ी मीर के पिता अली मुत्तक़ी अपने ज़माने के मशहूर व्यक्ति थे. मीर जब 11-12 वर्ष के थे तो उनके पिता का देहांत हो गया. पिता की मौत के बाद कोई सहारा न होने के चलते बड़ी बेबसी की हालत में मीर तक़ी मीर ने दिल्ली का रुख किया. दिल्ली में बादशाह समसामुद्दौला ने उनके लिए प्रतिदिन एक रुपया वजीफा के लिए तय कर दिया.

बताते हैं कि 1739 में फ़ारस के नादिरशाह के भारत पर हमले के दौरान बादशाह समसामुद्दौला खेत हुए. समसामुद्दौला के चले जाने से मीर तक़ी मीर का वजीफा बंद हो गया. और इन्हें आगरा छोड़ना पड़ा. मीर साहब ने दिल्ली का रुख किया. लेकिन दिल्ली उजाड़ थी. हर तरफ कत्ल ही कत्ल का मंजर था. कहा जाता है किन किसी ने नादिरशाह के मरने की झूठी खबर फैला दी. इस पर गुस्साए नादिरशाह ने दिल्ली में एक ही दिन में बीस हजार से अधिक लोगों को मरवा दिया और भयानक लूट मचाई थी. इस दर्द को मीर कुछ इस तरह लिखते हैं-

दिल की वीरानी का क्या मज्कूर है
ये नगर तो सौ मतर्बा लूटा गया।
(मज्कूर- चर्चा)

दिल्ली के लूटने-टूटने के क्रम में मीर तक़ी मीर एक शायर के रूप में मशहूर हो चुके थे, लेकिन दिवाने शायर के रूप में. लेकिन इस दीवाने के दिल में उठने वाले दर्द से वो ही अनजान था जिसके लिए मीर दीवाना हुआ. वह कहते भी हैं-

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने ने जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है।

मीर तक़ी मीर दिल्ली में अपने सौतेले भाई के मामा सिराजुद्दीन अली खान आरजू के यहां रहते थे. सिराजुद्दीन भी बड़े शानदार शायर थे. दिल्ली में रहते हुए मीर साहब मुहब्बत के शिकार हुए. बताते हैं कि उन्हें बेहद खूबसूरत महताब बेगम से मोहब्बत हो गई. महताब बेगम भी मीर के शायराना अंदाज पर फिदा थीं. अब मीर इश्क में डूबी शायरी करने लगे. उनकी शायरी कहने का ढंग निराला था, जो भी सुनता उनका मुरीद हो जाता. इस तरह मीर मशहूर हो गए. लेकिन मीर की मुहब्बत को दुनिया की नजर लग गई और नजर ऐसी लगी कि दिल्ली के बादशाह के साथ इस बात पर उनका तकरार हो गया. और मीर एक मुहब्बत में चोट खाए आशिक हो गए.

मीर तक़ी मीर अपनी शायरी में जिस सच्चाई और आसानी के साथ मुद्दों को बयान करने की काबलियत रखते हैं उसकी मिसाल मुश्किल ही से कहीं और मिलती है-

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया।

मीर कहते हैं जिसे मुहब्बत हो गई उसे अपने महबूब के अलावा दुनिया में कुछ नजर नहीं आता. कहते हैं ना- तुझ में रब बसता है. और जिसने रब से राब्ता कर लिया उसे फिर और क्या चाह रह जाती है. इश्कवालों को तो महबूब की आंखों में ही दुनिया नजर आती है. इस बात को मीर साहब ने कितनी खूबसूरती के साथ कहा है-
जिस ने तेरी नजर को देख लिया
उसको दुनिया नजर नहीं आती।

एक शेर में मीर कहते हैं- कौन मकसद को इश्क बिना पहुंचा, आरजू इश्क मुद्दआ है इश्क. यानी कोई भी मोहब्बत बिना मकसद के नहीं करता है और यहां मोहब्बत ही जिंदगी का मकसद है.

मीर तक़ी मीर की शायरी में उपमा की इंतिहा देखने को मिलती है. वे कहते हैं कि इश्क में डूबे आदमी को अपने महबूब की हर चीज दुनिया जहान की सबसे खूबसूरत चीज नजर आती है. एक शेर में मीर साहब ने अपने महबूब के होंठों की उपमा गुलाब की पंखुड़ियों से की है. सच में कितना बेहतरीन शेर है यह-

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।

इस शेर में महबूब की मासूमियत है, सादगी, नाजुकता है और हुश्न है. जब भी हुश्न की जिक्र होता है तो होंठों की तारीफ के बिना बात अधुरी रहती है. क्योंकि, महबूब के होंटों का बयान बहुत अहम है. और यहां मीर अपने महबूब के होंठों को गुलाब की पंखुड़ी कहते हैं. चूंकि गुलाब का फूल बहुत नाजुक और बेहद खूबसूरत होता है. इसलिए महबूब के होंठ की तुलना गुलाब की पंखुड़ी के अलावा किसी और चीज से की ही नहीं जा सकती है.

इश्क, मोहब्बत की चाशनी से सराबोर मीर तक़ी मीर साहब के कुछ शेर यहां पेश किए जा रहे हैं. आप भी इनका आनंद उठाएं-

हम तौर-ए-इश्क से तो वाकिफ नहीं हैं लेकिन
सीने में जैसे कोई दिल को मला करे है।

अब सीने में मोहब्बत पैदा ही हो गई है तो इसके अंजाम का भफी पता होना चाहिए. इसके लिए मीर का एक शेर बहुत मशहूर है-
राह-ए-दूर-ए-इश्क में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या।

आप इश्क में हैं और दिल में जख्म ना हो, यह मुमकिन ही नहीं है. लेकिन तमाम दर्द और जख्म के बाद भी दिल लगाना भला कौन छोड़ पाता है. इस पर मीर तक़ी मीर कहते हैं-
जख्म झेले दाग भी खाए बहुत
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत।

इश्क तो अच्छे-अच्छो को जला कर राख कर देता है. इश्क शुरू तो एक शोले की तरह होता है लेकिन अंजाम तक पहुंचते-पहुंचते वह खाक में तब्दील हो जाता है. मीर तक़ी मीर मोहब्बत को कभी आग कहते हैं तो कभी एक बोझ. इसकी बानगी इन शेर में देखी जा सकती है-

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क में हम
अब जो हैं खाक इंतिहा है ये।
(इब्तिदा-ए-इश्क=इश्क की शुरूआत )

इश्क इक मीर भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना=तवां से उठता है।
(ना तवां- कमजोर)

इश्क कभी आग है तो कभी भारी पत्थर. इसके पीछे मीर तक़ी मीर महबूब के सितम और आशिक की कमजोरी को वजह मानते हैं-

जौर क्या-क्या जफाएं क्या-क्या हैं
आशिकी में बलाएं क्या-क्या हैं।
(जौर- अत्याचार, जफाएं- अत्याचार)

इश्क वो चीज है जो आशिक को पूरी दुनिया से अलग कर देता है. उसे तो बस महबूब के सिवाय कुछ अच्छा नहीं लगता. आशिक के अपने दोस्त, उसका परिवार और समाज सब दूर होता चला जाता है-

फिरते हो मीर साहब सहब से जुदे-जुदे तुम
शायद कहीं तुम्हारा दिल इन दिनों लगा है।

वो क्या चीज है आह जिस के लिए
हर इक चीज से दिल उठा के चले।

सुना जाता है शहर ए इश्क के गिर्द
मजारें ही मजारें हो गई हैं।

क्या कहूं तुम से मैं कि क्या है इश्क
जान का रोग है बला है इश्क।

दिखाई दिए यूं कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले।

शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए

वाकई मीर तक़ी मीर शब्दों के जादूगर हैं. मीर साहब की रचनाओं में वो जादू है कि जो इनके करीब आता है जकड़ता चला जाता है. और फिर वह इनसे खुद को आजाद करने की कभी नहीं सोचता. मीर की शायरी के जादू का असर इस बात से समझा जा सकता है कि लगभग ढाई सौ साल बाद भी उनके शेर लोगों की जुबान पर रहते हैं.

मशहूर शायर नासिर काज़मी ने तो मीर के शेरों की तारीफ में कहा है-
शेर होते हैं मीर के नासिर
लफ़्ज बस दाएं बाएं करता है।

मीर की गज़लों के कुल छह दीवान हैं. मीर के शेरों यानी अशआर की संख्या 15 हजार से ज्यादा है. नस्र में उनकी तीन किताबें ‘नकात-उल-शोरा’, ‘ज़िक्र-ए-मीर’ और ‘फ़ैज़-ए-मीर. हैं.

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